बालमुकुंद गुप्त का जीवन परिचय | Balmukund Gupt Ka Jivan Parichay

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बालमुकुंद गुप्त (Balmukund Gupt Biography) का जीवन परिचय, साहित्यिक विशेषताएं, रचनाएँ एवं भाषा शैली और उनकी प्रमुख रचनाएँ एवं कृतियाँ। बाबू बालमुकुंद गुप्त का जीवन परिचय एवं साहित्यिक परिचय नीचे दिया गया है।

विवरणजानकारी
नामबालमुकुंद गुप्त
जन्म14 नवंबर 1865 ई.
जन्म स्थानगांव गुड़ियानी, झज्जर जिला (हरियाणा)
पिता का नामपूरणमल गोयल
सम्पादित पत्रिकाएँहिन्दोस्तान, हिन्दी बंग वासी, भारत मित्र
प्रमुख रचनाएँशिव शंभू के चिट्ठे, चिट्ठे और खत, खेल तमाशा
निधनसन् 1907 ई.
जीवंत आयु42 वर्ष

बालमुकुंद गुप्त का जीवन परिचय in short:

जीवन-परिचय- बाबू बालमुकुंद गुप्त का जन्म हरियाणा के जिला झज्जर के गाँव गुड़ियानी में सन् 1865 ई० में हुआ था। इनके पिता का नाम लाला पूरनमल तथा पितामह का नाम लाला गोवर्धन दास था। इनका परिवार बख्शी राम वालों के नाम से प्रसिद्ध था। इनके एक चाचा की युवावस्था में मृत्यु हो जाने के कारण इनका पालन-पोषण विधवा चाची के द्वारा किया गया था। पंद्रह वर्ष की छोटी आयु में इनका विवाह रेवाड़ी के एक प्रतिष्ठित परिवार में अनार देवी के साथ हुआ था। इनके पुत्र-पौत्र कलकत्ता (कोलकाता) में रहकर व्यवसाय करते हैं। गुप्त जी की प्रारंभिक शिक्षा गाँव में ही हुई थी।

दस वर्ष की आयु में इन्हें राकिन स्कूल में प्रविष्ट कराया गया। इनके स्कूल के मुख्याध्यापक इनकी अध्ययनशील और सहनशील प्रकृति से बहुत प्रभावित थे। स्कूल स्तर पर इन्हें पूरे पंजाब का सर्वश्रेष्ठ छात्र घोषित किया गया था और इन्हें छात्रवृत्ति दी गई थी। पर अपने दादा और पिता की मृत्यु के कारण अपनी शिक्षा पूरी नहीं कर पाये थे। बाद में इन्होंने फिर से पढ़ना आरंभ किया था और इक्कीस वर्ष की आयु में मिडिल कर सके थे। इन्होंने उर्दू भाषा पर विशेष अधिकार प्राप्त किया था।

गुप्त जी अपने समय के कुशल संपादक और विनोदप्रिय लेखक थे। इन्होंने उर्दू के दो पत्रों-‘ अखबारे चुनार तथा ‘कोहेनूर’ का संपादन किया था। बाद में इन्होंने तीन दैनिक पत्रों ‘हिंदोस्तान’, ‘हिंदी बंगवासी’ तथा ‘भारत मित्र’ का संपादन किया था। ‘भारत प्रताप’ तथा ‘भारत मित्र’ पत्रों से जुड़ कर इन्होंने लेखन कार्य में विशेष क्षमता प्राप्त कर ली थी। गुप्त जी का देहावसान 42 वर्ष की अल्पायु में सन् 1907 में हो गया था।

बालमुकुंद गुप्त की रचनाएं:

रचनाएं – गुप्त जी की रचनाओं के पाँच संग्रह अब तक प्रकाशित हुए हैं-शिवशंभु के चिट्ठे, स्फुट कविताएं, गुप्त निबंधावली, चिट्ठे और खत। इन पाँच संग्रहों में इनकी अनेक गद्य-पद्य रचनाएं प्रकाशित हो चुकी हैं पर इनके पचास-साठ महत्त्वपूर्ण निबंध अभी भी अप्रकाशित हैं।

बालमुकुंद गुप्त की साहित्यिक विशेषताएँ:

साहित्यिक विशेषताएँ- बालमुकुंद गुप्त भारतीय साहित्य के एक महत्वपूर्ण और प्रतिभाशाली कवि थे, और उनकी साहित्यिक विशेषताएँ उनके लेखन को अनूठा बनाती थीं। प्रथम भाषा में लिखने के कारण, उनकी रचनाएं अपने समृद्ध भाषा और अलंकारिक शैली के लिए प्रसिद्ध थीं। उनकी कविताओं में राष्ट्रीय एकता और स्वाधीनता के प्रति गहरा विश्वास प्रकट होता था।

गुप्त जी ने देशभक्ति पूर्ण साहित्य की अधिक रचना की है। तत्कालीन ब्रिटिश सरकार पर इन्होंने व्यंग्यात्मक लेख भी लिखे हैं।

बालमुकुंद गुप्त ने अपनी रचनाओं में भारतीय ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को महसूस करवाया। उन्होंने भगवान शिव के प्रति अपनी अद्भुत भक्ति को ‘शिव शम्भू के चिट्ठे’ के रूप में व्यक्त किया, जो आज भी उनकी महानता का साक्षात्कार है।

बालमुकुंद गुप्त को निम्नलिखित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है:

  1. साहित्य अकादमी पुरस्कार: बालमुकुंद गुप्ता को 1958 में साहित्य अकादमी द्वारा हिंदी साहित्य में उनके महत्वपूर्ण योगदान के लिए सम्मानित किया गया था।
  2. पद्मश्री: भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से भी नवाजा था, जो देश में सिविलियनों को सम्मानित करने वाले उच्चतम नागरिक पुरस्कारों में से एक है। इस प्रतिष्ठित पुरस्कार का उन्हें सम्मान उनके साहित्यिक उत्कृष्टता के प्रति एक मान्यता थी।

बालमुकुंद गुप्त की भाषा शैली:

भाषा-शैली – इनकी भाषा-शैली के संबंध में आचार्य रामचंद्र शुक्ल का मानना है कि “गुप्त जी की भाषा बहुत चलती, सजीव और विनोदपूर्ण होती थी। किसी प्रकार का विषय हो, गुप्त जी की लेखनी इस पर विनोद का रंग चढ़ा देती थी। वे पहले उर्दू के एक अच्छे लेखक थे। इससे उनकी हिंदी बहुत चलती और फड़कती हुई थी। वे अपने विचारों को विनोदपूर्ण वर्णनों के भीतर ऐसा लपेट कर रखते थे कि उनका आभास बीच-बीच में मिलता था। उनके विनोदपूर्ण वर्णनात्मक विधान के भीतर विचार और भाव लुके-छिपे से रहते थे। यह उनकी लिखावट की बड़ी विशेषता थी।”

विदाई संभाषण’ पाठ में भी इनकी भाषा-शैली के गंभीर रूप से दर्शन होते हैं। भाषा में गंभीरता साफ़-स्पष्ट देखी जा सकती है। जैसे- “यहाँ की प्रजा वह प्रजा है, जो अपने दुःख और कष्टों की अपेक्षा परिणाम का अधिक ध्यान रखती है। वह जानती है कि संसार में सब चीजों का अंत है। दुःख का समय भी एक दिन निकल जाएगा। इसी से सब दुःखों को झेलकर, पराधीनता सहकर भी वह जीती है।” व्यंग्य तो गुप्त जी की भाषा में अनेक स्थान पर आया है। लॉर्ड कर्जन पर व्यंग्य करते हुए वे लिखते हैं-” आपका पद छूट गया तथापि आपका पीछा नहीं छूटा है।

एक अदना क्लर्क जिसे नौकरी छोड़ने के लिए एक महीने का नोटिस मिल गया हो नोटिस की अवधि बड़ी घृणा से काटता है। आपको इस समय अपने पद पर रहना कहाँ तक पसंद है यह आप ही जानते होंगे।” इसके अतिरिक्त गुप्त – जी का वाक्य विन्यास भी अत्यंत प्रभावशाली है। इस प्रकार गुप्त जी की भाषा में तत्सम तद्भव तथा विदेशी शब्दों का विषयानुकूल सार्थक प्रयोग हुआ है। इनकी शैली वर्णनात्मक, आत्मपरक तथा व्यंग्यात्मक है। इनके व्यंग्य अत्यंत पैने तथा मर्मभेदी होते हैं।

बालमुकुंद गुप्त का जन्म और जीवनी कैसी थी?

उत्कृष्ट हिंदी कवि बालमुकुंद गुप्त, 14 नवंबर 1865 को हरियाणा के झज्जर जिले में गुड़ियानी गाँव में पैदा हुए थे। उनकी रचनाएँ राष्ट्रीय चेतना को प्रेरित करती थीं।


बालमुकुंद गुप्त का जन्म कब और कहाँ हुआ था?

बालमुकुंद गुप्त का जन्म 14 नवंबर 1865 ई. में हरियाणा के झज्जर जिले में स्थित गांव गुड़ियानी में हुआ था।

बालमुकुंद गुप्त की दो रचनाएं कौन सी हैं?

बालमुकुंद गुप्त की दो रचनाएं हैं: शिव शंभू के चिट्ठे, चिट्ठे और खत।

बालमुकुंद गुप्त की कुछ प्रसिद्ध रचनाएँ कौन-कौन सी हैं?

बालमुकुंद गुप्त की कुछ प्रसिद्ध रचनाएँ हैं: “भारतवर्ष की प्रथम गाथा”, “वीर सावरकर”, “प्रेमचंद”, “सुभाष चंद्र”, “झांसी की रानी” आदि।

बालमुकुंद गुप्त को कौन-से पुरस्कार से नवाजा गया था?

बालमुकुंद गुप्त को 1958 में साहित्य अकादमी पुरस्कार और पद्मश्री से सम्मानित किया गया था।

बालमुकुंद गुप्त की मृत्यु कब हुई?

बालमुकुंद गुप्त की मृत्यु सन् 1907 ई. में हुई थी।

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