रानी दुर्गावती का जीवन परिचय | Rani Durgavati ka Jivan Parichay

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रानी दुर्गावती का जीवन परिचय(Biography of Rani Durgavati)

भारत के इतिहास में कई ऐसे वीर और वीरांगना हैं, जिन्होंने अपनी जान की परवाह किए बिना अपने राज्य, धर्म और आत्मसम्मान की रक्षा के लिए लड़ा है। उनमें से एक थी रानी दुर्गावती, जो 16वीं शताब्दी में गोंडवाना की शासक महारानी थीं। उन्होंने मुगल साम्राज्य के आक्रमण का सामना किया, और अंत में अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। आइए जानते हैं उनकी मृत्यु की कहानी।

रानी दुर्गावती का इतिहास | History of Queen Durgavati

जीवन परिचय बिंदुविवरण
नामरानी दुर्गावती
जन्म5 अक्टूबर सन 1524
जन्म स्थानकालिंजर किला (बाँदा, उत्तर प्रदेश)
पिताकीरत राय
पतिदलपत शाह
संतानवीर नारायण
धर्महिन्दू
प्रसिद्धीगोंडवाना राज्य की शासक, वीरांगना
मृत्यु24 जून 1564
कर्म भूमिभारत
विशेष योगदानइन्होंने अनेक मंदिर, मठ, कुएं और धर्मशालाएं बनवाई
मृत्यु स्थानजबलपुर, मध्य प्रदेश
  • मृत्यु स्थान को लेकर भिन्न मत हैं। कुछ इतिहासकारों का मानना ​​है कि रानी दुर्गावती का मृत्यु स्थान जबलपुर, मध्य प्रदेश है, जबकि अन्य का मानना ​​है कि यह महाराष्ट्र था।

रानी दुर्गावती की फोटो(Photo of Rani Durgavati)

रानी दुर्गावती की फोटो:

रानी दुर्गावती कौन थी (who was queen durgavati)

रानी दुर्गावती भारतीय इतिहास में एक वीरांगना के रूप में प्रसिद्ध हैं। उन्होंने 16वीं शताब्दी में मुगल साम्राज्य के खिलाफ अपने राज्य की रक्षा के लिए बहादुरी से लड़ाई लड़ी। रानी दुर्गावती गोंडवाना की शासक थीं, जो चंदेल राजपूत राजवंश की राजकुमारी थीं। उन्होंने अपने पति दलपत शाह के साथ गोंड राज्य का प्रशासन किया। उनका नाम इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में लिखा गया है, क्योंकि वे मुगल साम्राज्य के आगे नहीं झुकीं।

रानी दुर्गावती ने तीन बार मुगल सेना को हराया और अपने बलिदान से लोगों का सम्मान प्राप्त किया। उन्होंने अपने छोटे बेटे की संरक्षा करते हुए राज्य की समृद्धि के लिए प्रयास किया। उनकी बहादुरी, उदारता, और बुद्धिमत्ता को याद किया जाता है। वे अपने राज्य की रक्षा में अपनी जान की परवाह किए बिना लड़ीं और अंततः अपना बलिदान दे दिया।

रानी दुर्गावती का जन्म और प्रारंभिक जीवन(Birth and early life of Rani Durgavati)

रानी दुर्गावती का जन्म 5 अक्टूबर 1524 को चंदेल राजवंश के शासक कीरत राय के घर में हुआ था। उनका जन्मस्थान कालिंजर किला था, जो आज के बाँदा जिले में स्थित है। रानी दुर्गावती के पिता चंदेल राजवंश के सबसे बड़े शासक थे, जो महमूद गजनी को युद्ध में खदेड़ा थे और खजुराहों के प्रसिद्ध मंदिरों के निर्माणकर्ता भी थे।

रानी दुर्गावती का जन्म दुर्गाष्टमी के दिन हुआ, जिससे उनका नाम दुर्गावती रखा गया। उनकी रूचि तलवारबाजी और तीरंदाजी में थी, और वे शेर और चीते का शिकार करने के लिए भी प्रसिद्ध थीं। उन्हें बन्दूक का भी अच्छा खासा अभ्यास था। बचपन में, उन्होंने घुड़सवारी भी सीखी और अपने पिता के साथ शिकार में भी जाती थीं।

18 वर्ष की उम्र में, रानी दुर्गावती ने गोंडवाना के राजा दलपत शाह से विवाह किया और गोंडवाना की रानी बनी। उन्होंने अपने पति के साथ मिलकर अपने राज्य को समृद्ध और सुरक्षित बनाने के लिए प्रयास किए। उनकी साहसिकता, बुद्धिमत्ता और समर्पण की कहानियाँ आज भी लोगों के दिलों में बसी हैं।

रानी दुर्गावती का विवाह और उसके बाद का जीवन(Rani Durgavati’s marriage and later life)

रानी दुर्गावती का विवाह 1542 में गढ़ा मंडला के राजा दलपत शाह से हुआ था। विवाह के बाद वे गढ़ा मंडला की रानी बन गईं। 1550 में, राजा दलपत शाह की मृत्यु के बाद, रानी दुर्गावती ने अपने पुत्र वीर नारायण के लिए राज्य की बागडोर संभाली।

रानी दुर्गावती एक कुशल शासक थीं। उन्होंने राज्य में कई सुधार किए और शिक्षा, स्वास्थ्य, और कृषि के क्षेत्र में विशेष ध्यान दिया। उन्होंने अनेक मंदिर, मठ, कुएं, और धर्मशालाएं भी बनवाईं। उनका विवाह उनके जीवन में एक महत्वपूर्ण मोड़ था, जिसने उन्हें न केवल एक शक्तिशाली रानी बनाया, बल्कि एक समर्पित माँ भी।

रानी दुर्गावती के कार्य(Works of Rani Durgavati)

रानी दुर्गावती गोंडवाना की शासक महारानी थीं, जिन्होंने अपने राज्य को शक्तिशाली और समृद्ध बनाया।

रानी दुर्गावती के कार्य:

  • कुशल शासक: रानी दुर्गावती एक कुशल शासक थीं। उन्होंने अपने राज्य में अनेक सुधार किए। उन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य, और कृषि के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य किए।
  • वीर योद्धा: रानी दुर्गावती एक वीर योद्धा थीं। उन्होंने मुगलों के खिलाफ वीरतापूर्ण युद्ध लड़ा। 24 जून 1564 को हुए युद्ध में वे वीरगति को प्राप्त हुईं।
  • देशभक्त: रानी दुर्गावती एक देशभक्त थीं। उन्होंने अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए अपना बलिदान दिया।
  • महिला सशक्तिकरण: रानी दुर्गावती महिला सशक्तिकरण का प्रतीक हैं। उन्होंने महिलाओं के लिए शिक्षा और समानता की वकालत की।

रानी दुर्गावती का शासनकाल(Reign of Queen Durgavati)

रानी दुर्गावती के गोंडवाना राज्य का शासक बनने के बाद, उन्होंने अपनी राजधानी को सिंगौरगढ़ से चौरागढ़ में स्थानांतरित कर दिया। वह अपने राज्य को प्राकृतिक सुरक्षा प्रदान करने के लिए पहाड़ियों, जंगलों और नालों के बीच स्थित कर इसे एक सुरक्षित जगह बना लिया।

उन्होंने एक उदार संरक्षक और अच्छी तरह से सुसज्जित सेना का निर्माण किया और अपने राज्य में विकास के लिए कई मंदिरों, भवनों, और धर्मशालाओं का निर्माण किया। रानी दुर्गावती के शासनकाल में उनके राज्य में वृद्धि हुई और वह एक समृद्ध और सम्पन्न राज्य बन गया। उन्होंने अपनी शक्ति और साहस से अपने राज्य की सुरक्षा और विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

रानी दुर्गावती की लड़ाई(battle of queen durgavati)

1562 में, असफ़ खान ने रानी दुर्गावती के राज्य पर हमला किया, जिसे रानी ने अपने साहस और सामर्थ्य से प्रतिभागी बनाया। वे युद्ध के दौरान अपने बेटे वीर नारायण के साथ बहादुरी से लड़ीं। यह लड़ाई जबलपुर जिले के नराइ नाले के पास हुई, जहां रानी ने अपने सेना के साथ मुघल सेना के खिलाफ ब्रावों से युद्ध किया।

रानी दुर्गावती ने अपने सामर्थ्य का परिचय किया और अपनी सेना को जीत के लिए प्रेरित किया। 1564 में भी, उन्होंने अपने साहस का परिचय दिया और मुघल सेना के खिलाफ अग्रसर होकर अपने राज्य की रक्षा की। रानी ने अपने साहस और निर्णय के माध्यम से अपने वीर नारायण को सुरक्षित रखा और विजयी बनीं।

रानी दुर्गावती की मुगलों के खिलाफ युद्ध(Rani Durgavati’s war against the Mughals)

रानी दुर्गावती की मुगलों के खिलाफ युद्ध एक ऐतिहासिक घटना है, जिसमें गोंडवाना की शासक महारानी ने अपने राज्य की आजादी के लिए मुगल साम्राज्य के आक्रमण का मुकाबला किया। यह युद्ध 1564 ईस्वी में हुआ, जब अकबर ने अपने गवर्नर आसफ खान को गोंडवाना पर आक्रमण करने का आदेश दिया। रानी दुर्गावती ने अपनी सेना का नेतृत्व करके आसफ खान के विरुद्ध लड़ाई लड़ी, और उन्हें कई बार पराजित किया। लेकिन आसफ खान ने अपनी सेना को पुनः संगठित करके रानी के ऊपर एक भयानक हमला किया, जिसमें रानी की सेना को भारी नुकसान उठाना पड़ा।

रानी दुर्गावती ने अपने बेटे वीर नारायण के साथ अंतिम युद्ध में भाग लिया, और अपने शत्रुओं को बहुत नुकसान पहुंचाया। लेकिन उनकी सेना में घाटा होने लगा, और उन्हें घिरने का खतरा बढ़ गया। रानी ने अपने बेटे को भागने का आदेश दिया, लेकिन वह मानने को तैयार नहीं था। रानी ने अपने बेटे को अपने आँखों के सामने मारा देखा, और उन्हें असह्य हुआ। उन्होंने अपने शत्रु को अपने हाथ में नहीं जाने दिया, और अपनी छाती में अपनी कटार घोंप ली। रानी दुर्गावती की मृत्यु एक वीरांगना का बलिदान था, जिसका सम्मान आज भी किया जाता है।

रानी दुर्गावती की मृत्यु (Rani Durgavati Death)

लगभग दो वर्षों के बाद, 1564 में, असफ खान ने पुनः हमले की योजना बनाई। रानी दुर्गावती ने इस सूचना को प्राप्त करते ही राज्य की सुरक्षा के लिए रणनीति बनाई।

रानी दुर्गावती ने रात्रि में हमला करने का निर्णय लिया, लेकिन उनके सलाहकारों ने इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया। अगली सुबह, आसफ खान ने बड़ी तोपों के साथ युद्ध के मैदान में प्रवेश किया। रानी दुर्गावती, अपने हाथी सरमन पर सवार होकर युद्ध के लिए उपस्थित हुईं, और उनके बेटे वीर नारायण भी इस लड़ाई में भाग लिया। वीर नारायण ने मुगल सेना को तीन बार पीछे हटने पर मजबूर किया, लेकिन वह खुद घायल हो गए और सुरक्षित स्थान पर पहुँचना पड़ा।

युद्ध के काल में, रानी को एक तीर लगा, जिससे वह घायल हो गई। इससे उनकी चेतना हार गई। अपने पराजय का सामना करते हुए, रानी ने खुद को खंजर से घायल कर लिया। इस महान बलिदान के साथ, रानी दुर्गावती ने अपने राज्य की रक्षा के लिए अपने जीवन को समाप्त किया।

रानी दुर्गावती की समाधि (Rani Durgavati Samadhi)

रानी दुर्गावती की पुण्यतिथि (24 जून 1564) आज भी “बलिदान दिवस” के रूप में मनाई जाती है। इतिहासकारों के मुताबिक, उनकी समाधि वर्तमान में मंडला और जबलपुर के बीच स्थित बरेला में है, जहां लोग अभी भी उनकी स्मृति में आध्यात्मिक दर्शन के लिए जाते हैं। वहां पर उन्होंने प्राण त्याग किया था।

1983 में, मध्यप्रदेश सरकार ने जबलपुर विश्वविद्यालय का नाम “रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय” रखा गया। भारत सरकार ने 24 जून 1988 को उनकी शहादत को याद करते हुए एक डाक टिकट जारी करके रानी दुर्गावती को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की थी।

उनकी समाधि, जबलपुर, मध्य प्रदेश में स्थित, वीरता और बलिदान का स्मारक है। यह एक साधारण, शांत जगह है, जो रानी के सादा जीवन और उच्च चरित्र को दर्शाता है।

समाधि परिसर में:

  • रानी दुर्गावती की समाधि
  • उनके पुत्र वीर नारायण की समाधि
  • एक छोटा संग्रहालय जिसमें रानी दुर्गावती से संबंधित वस्तुएं प्रदर्शित की गई हैं
  • एक सुंदर बगीचा

रानी दुर्गावती कौन थी?

रानी दुर्गावती गढ़ा-मंडला राज्य की वीरांगना रानी थीं। उन्होंने मुगल सम्राट अकबर की सेना से युद्ध करते हुए वीरगति प्राप्त की थी।

रानी दुर्गावती का जन्म कब हुआ?

रानी दुर्गावती का जन्म 5 अक्टूबर 1524 को कालिंजर के किले में हुआ था। उनके पिता कीर्तिवर्मन द्वितीय चन्देल, महोबा के राजा थे।

रानी दुर्गावती कहां की रानी थी?

रानी दुर्गावती गढ़ा-कटंगा राज्य की रानी थीं। यह राज्य मध्य प्रदेश के वर्तमान जबलपुर और मंडला जिलों में फैला हुआ था।

रानी दुर्गावती के पुत्र का क्या नाम था?

रानी दुर्गावती के पुत्र का नाम वीर नारायण था। वीर नारायण महज 8 वर्ष के थे जब उनकी माता का देहांत हुआ।

रानी दुर्गावती की समाधि कहां है?

रानी दुर्गावती की समाधि मध्य प्रदेश के जबलपुर ज़िले में स्थित नरवर नामक स्थान पर है। यह समाधि 1564 में रानी के वीरगति प्राप्त करने के बाद बनवाई गई थी।

रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय कहां है?

रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय भारत के मध्य प्रदेश राज्य में स्थित है। यह जबलपुर शहर में स्थित है, जो नर्मदा नदी के किनारे बसा है। यह विश्वविद्यालय 1956 में स्थापित किया गया था और इसका नाम 1983 में रानी दुर्गावती के नाम पर रखा गया था।

रानी दुर्गावती की मृत्यु कब हुई?

रानी दुर्गावती की मृत्यु 24 जून 1564 को हुई थी। उन्होंने मुगलों के खिलाफ लड़ाई में वीरतापूर्वक लड़ते हुए अपना जीवन त्याग दिया।

रानी दुर्गावती जयंती कब है?

रानी दुर्गावती जयंती हर साल 5 अक्टूबर को मनाई जाती है। 2024 में यह गुरुवार को आएगी।

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