Monday, October 3, 2022
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कवि दुष्यंत कुमार का जीवन परिचय | Dushyant Kumar Biography In Hindi

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कवि दुष्यंत कुमार का जीवन परिचय, रचनाएँ, कविताएँ | Dushyant Kumar (Poet) Biography, Family, Gazal, Poems, Books In Hindi

दुष्यंत कुमार हिंदी कवि एवं गजलकार थे। भारत के महान गजलकारों में उनका नाम सबसे ऊपर आता है। हिंदी गजलकार के रूप में जो लोकप्रियता दुष्यंत कुमार को मिली वो दशकों में शायद ही किसी को मिली हो। वह एक कालजयी कवि थे और ऐसे कवि समय काल मे परिवर्तन होने के बाद भी प्रासंगिक रहते हैं। इनकी कविता एवं गज़ल के स्वर आज तक संसद से सड़क तक गुंजते है। इन्होंने हिंदी साहित्य में काव्य, गीत, गज़ल, कविता, नाटक, उपन्यास, कथा आदि अनेक विधाओं में लेखन किया। लेकिन उन्हें गज़ल में अत्यंत लोकप्रियता प्राप्त हुई।

कवि दुष्यंत कुमार का संक्षिप्त जीवन परिचय | Dushyant Kumar Biography In Hindi

बिंदुजानकारी
नामदुष्यंत कुमार त्यागी
जन्म1 सितम्बर 1931
आयु44 वर्ष
जन्म स्थानग्राम राजपुर नवादा, उत्तरप्रदेश
पिता का नामचौधरी भगवत सहाय
माता का नामराजकिशोरी देवी त्यागी
पत्नी का नामराजेश्वरी कौशिक
पेशालेखक, कवि
निधन30 दिसम्बर 1975
प्रसिद्धिग़ज़ल

प्रारंभिक जीवन एवं परिवार

महान गज़लकार दुष्यंत कुमार का जन्म 1 सितम्बर 1933 को माना जाता है। लेकिन दुष्यन्त साहित्य के मर्मज्ञ विजय बहादुर सिंह के अनुसार इनकी वास्तविक जन्मतिथि 27 सितंबर 1931 है। इनका जन्म उत्तर प्रदेश के बिजनौर जनपद की तहसील नजीबाबाद के ग्राम राजपुर नवादा में हुआ। इनका पूरा नाम दुष्यंत कुमार त्यागी था। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा नहटौर, जनपद-बिजनौर में हुई। उन्होंने हाई स्कूल की परीक्षा एन.एस.एम. इन्टर कॉलेज चन्दौसी, मुरादाबाद से उत्तीर्ण की। उच्च शिक्षा के लिए 1954 में उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम.ए.की डिग्री प्राप्त की। अपनी कॉलेज की शिक्षा के समय 1949 में उनका विवाह राजेश्वरी से हुआ। वास्तविक जीवन में दुष्यंत बहुत, सहज, सरल और मनमौजी व्यक्ति थे।

दुष्यंत कुमार का कार्यक्षेत्र

दुष्यंत कुमार ने कक्षा दसवीं से ही कविता लिखना प्रारंभ कर दिया था। प्रारम्भ में वे परदेशी के नाम से लेखन करते थे। 1958 में उन्होंने आकाशवाणी, दिल्ली में पटकथा लेखक के रूप में कार्य किया। 1960 में वे सहायक निर्देशक के पद के रूप में उन्नत होकर आकाशवाणी, भोपाल आ गए। आकाशवाणी के बाद वे मध्यप्रदेश के संस्कृति विभाग के अंतर्गत भाषा विभाग में रहे। इस दौरान आपातकाल के समय उनका कविमन अत्यंत क्षुब्ध और आक्रोशित हो उठा जिसकी अभिव्यक्ति उनके द्वारा कुछ कालजयी ग़ज़लों के रूप में हुई।

दुष्यंत कुमार का काव्य परिचय

दुष्यंत कुमार ने हिदी साहित्य में अतुलनीय योगदान दिया। उन्होंने बहुत से नाटक, कविताए, उपन्यास, ग़ज़ल और लघु कहानियाँ लिखी। दुष्यंत कुमार ने जिस समय साहित्य की दुनिया में अपने कदम रखे उस समय भोपाल के दो प्रगतिशील शायरों ताज भोपाली तथा क़ैफ़ भोपाली का ग़ज़लों का दुनिया पर राज था। ऐसे समय मे उन्होंने अपनी गज़लों के माध्यम से अत्यंत लोकप्रियता हासिल की। उनकी गज़लो ने हिंदी गज़ल को नए आयाम दिए, उसे हर आम आदमी की संवेदना से जोड़ा. उनकी प्रत्येक गज़ल आम आदमी की गज़ल बन गयी। उनके लेखन में भ्रष्टाचार एक प्रमुख विषय था। दुष्यंत कुमार की कविता उभरती कवियों की पूरी पीढ़ी के लिए एक प्रेरणा बन गई ।

दुष्यंत कुमार की रचनाएं

कविताएं

  • मुक्तक
  • आज सड़कों पर लिखित हैं
  • मत कहो, आकाश में
  • धूप के पाँव
  • गुच्छे भर अमलतास
  • सूर्य का स्वागत
  • कहीं पेन्स की चादर
  • बाढ़ की संभावना
  • यह नदी की धार में
  • हो गया है पीर पर्वत-सी
  • किसी रेल सी गुज़रती है
  • कहाँ तो तय था
  • कैसे मनेर
  • खंडहर बचे हुए हैं
  • जो शहतीर है
  • ज़िंदगानी का कोई उद्देश्य नहीं
  • आवाजों के घेरे
  • जलते हुए वन का वसन्त
  • आज सड़कों पर
  • आग जलती रही
  • एक आशीर्वाद
  • आग जालनी चाहिए
  • मापदण्ड बदलो

उपन्यास

  • छोटे-छोटे सवाल
  • आँगन में एक वृक्ष
  • दुहरी ज़िंदगी

एकांकी

  • मन के कोण

नाटक

  • और मसीहा मर गया

गज़ल-संग्रह

  • साये में धूप
  • आदमी की पीर
  • आग जलनी चाहिए

दुष्यंत कुमार की कविता की प्रसिद्ध पंक्तियां

“हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,

इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए.

आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,

शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए.

हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,

हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए.

सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,

मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए.

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,

हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए.”

दुष्यंत कुमार की प्रमुख गज़ल

  • कहा तो तै था, चिरागां हरेक घर के लिए, कहां चिराग मयस्सर नही, शहर के लिए ।
  • आम आदमी बदहाली में जीने की विवशता झेल रहा है: न हो तो कमीज तो पांवों से पेट ढक लेंगे, ये लोग कितने मुनासिब है, इस सफर के लिए ।
  • आजादी के बाद हम अपनी संस्कृति को भूलकर शोषण की तहजीब को आदर्श मानने लगे हैं, अब नयी तहजीब की पेशे नजर हम, आदमी को भूनकर खाने लगे हैं।
  • कल की नुमाइश में मिला वो चीथड़े पहने हुए, मैंने पूछा नाम तो बोला कि हिन्दुस्तान है।

निधन

दुष्यंत कुमार की मृत्यु 30 दिसम्बर 1975 को मात्र 42 वर्ष की उम्र में हुई। इतनी कम उम्र में उन्होंने अनेक काव्य, गजल, नाटक, कविता, उपन्यास आदि की रचना कर हिंदी साहित्य में अपना अमूल्य योगदान दिया। तथा इनकी गजल एवं कविताओं ने इन्हें साहित्य में अमर कर दिया।

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